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आनंदी कुटुंब समृद्ध ग्राम के बारे में

आनंदी कुटुंब समृद्ध ग्राम (AKSG) एक दीर्घकालिक कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य मध्यस्थ दर्शन पर आधारित चेतना विकास मूल्य शिक्षा के माध्यम से परिवार-मूलक ग्राम स्वराज्य व्यवस्था की स्थापना करना है।

यह कार्यक्रम सहभागी परिवारों, समुदायों और संस्थाओं को साथ लाकर इस संभावना पर कार्य करता है कि शिक्षा किस प्रकार मानवीय व्यवस्था का आधार बन सकती है, जहाँ व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को समझें और परिवार सामुदायिक जीवन में सक्रिय भागीदारी करें।

AKSG मानव विकास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें शिक्षा को दैनिक आचरण, उत्पादन कार्य और सामाजिक व्यवस्था से जोड़ा गया है।

Why AKSG exists village community

हमारी दृष्टि

ऐसी मानवीय, परिवार-मूलक सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना, जिसमें व्यक्ति में समाधान, परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का अनुभव एवं व्यवहार हो।

यह दृष्टि मध्यस्थ दर्शन में प्रस्तावित चार मानव लक्ष्यों पर आधारित है।

  • 01. समाधानव्यक्ति में सही समझ और स्पष्टता का होना, जो उसके विचार, व्यवहार और जिम्मेदारीपूर्ण सहभागिता का आधार बने।
  • 02. समृद्धिपरिवार की निर्धारित भौतिक आवश्यकताओं से अधिक संसाधन उपलब्ध होने का विश्वास, जो जिम्मेदारीपूर्ण उत्पादन से सुनिश्चित होता है।
  • 03. अभयपरिवार और समाज के संबंधों में परस्पर विश्वास और न्याय की स्थापना, जिससे भयमुक्त सामाजिक वातावरण विकसित हो।
  • 04. सह-अस्तित्वमानव और शेष प्रकृति के बीच संबंधों को समझना तथा परस्पर पूरकता के साथ जीना।

हमारा उद्देश्य

शिक्षा पर आधारित ग्राम स्वराज्य व्यवस्था का एक व्यावहारिक स्वरूप विकसित करना, जिसमें परिवार स्वयं, समाज और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में सक्षम हों।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य निम्नलिखित के लिए आधार तैयार करना है:

  • मूल्य शिक्षा के माध्यम से सही समझ और मानवीय आचरण का विकास।
  • परिवार और सामाजिक संबंधों में विश्वास, न्याय और जिम्मेदारी की स्थापना।
  • उत्पादन कार्य और संसाधनों के सदुपयोग से समृद्धि।
  • परिवार-मूलक सामाजिक व्यवस्था में सामूहिक सहभागिता।
  • मानव समाज और प्रकृति के बीच परस्पर पूरकता का निर्वाह।

इसका दीर्घकालिक उद्देश्य ऐसे स्वावलंबी ग्राम समुदायों का विकास करना है, जो अपने सामूहिक कल्याण की जिम्मेदारी स्वयं संभाल सकें।

मध्यस्थ दर्शन पर आधारित

AKSG का दार्शनिक आधार मध्यस्थ दर्शन (सह-अस्तित्ववाद) है।

मध्यस्थ दर्शन अस्तित्व, मानव और संबंधों, समाज तथा प्रकृति में मानव की भागीदारी को समझने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार मानवीय आचरण का आधार सही समझ है।

चेतना विकास मूल्य शिक्षा एक ऐसी शैक्षणिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तावित है, जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं का अध्ययन कर सके, संबंधों में मूल्यों को पहचान सके और व्यापक सामाजिक एवं प्राकृतिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी को समझ सके।

AKSG के लिए यही शिक्षा, व्यक्ति और परिवार से प्रारंभ होकर मानवीय सामाजिक व्यवस्था के विकास का आधार बनती है।

मानव मूल्य
अस्तित्व सह-अस्तित्व है
परिवार मूल इकाई
मानव-प्रकृति सामंजस्य
एक धरती एक राष्ट्र एक परिवार
श्री ए. नागराज जी

मध्यस्थ दर्शन (सह-अस्तित्ववाद) के प्रणेता

श्री ए. नागराज जी1920–2016

श्री ए. नागराज जी ने अपना जीवन मानव अस्तित्व, सुख और सामंजस्य को समझने के लिए समर्पित किया। निरंतर अनुसंधान और साधना के माध्यम से उन्होंने मध्यस्थ दर्शन (सह-अस्तित्ववाद) प्रस्तुत किया, जो स्वयं, परिवार, समाज और प्रकृति के साथ सही समझ के आधार पर जीने का प्रस्ताव है।

उनका कार्य जीवन विद्या का दार्शनिक आधार प्रदान करता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति मानव जीवन, संबंधों और सह-अस्तित्व का अध्ययन तथा समझ विकसित कर सकता है।

आनंदी कुटुंब समृद्ध ग्राम कार्यक्रम मूल्य शिक्षा और परिवार-मूलक ग्राम विकास के अपने दृष्टिकोण में इसी समझ को आधार बनाता है।

“अस्तित्व सह-अस्तित्व है।”

मानव संबंधों के दो मूल क्षेत्र

AKSG का प्रस्ताव वर्तमान मानवीय समस्याओं को दो मूल क्षेत्रों में देखता है। पहला, मानव का अन्य मनुष्यों के साथ संबंध और दूसरा, मानव का शेष प्रकृति के साथ संबंध।

01. मानव–मानव संबंध

  • परिवारों में अविश्वास, संघर्ष, संवाद का अभाव, सामाजिक विभाजन और प्रतिस्पर्धा जैसी स्थितियाँ व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर संबंधों को प्रभावित करती हैं।

02. मानव–शेष प्रकृति संबंध

  • वनों की कटाई, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का क्षय, जैव विविधता में कमी और रासायनिक पदार्थों के अत्यधिक उपयोग पर आधारित उत्पादन पद्धतियाँ मानव गतिविधियों तथा शेष प्रकृति के बीच असंतुलन को दर्शाती हैं।

समाधान की दिशा

मानव–मानव संबंध

  • कार्यक्रम का प्रस्ताव है कि सही समझ विकसित होने पर व्यक्ति संबंधों की पहचान कर सकता है, मानवीय मूल्यों का निर्वाह कर सकता है और न्याय तथा परस्पर विश्वास स्थापित कर सकता है।
  • समाधान की दिशा: अविश्वास और संघर्ष से विश्वास, न्याय, सार्थक संवाद और परस्पर संतुष्टिपूर्ण संबंधों की ओर।

मानव–शेष प्रकृति संबंध

  • कार्यक्रम प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन, जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग तथा प्राकृतिक आवर्तनशीलता पर आधारित उत्पादन पद्धतियों का प्रस्ताव रखता है।
  • समाधान की दिशा: संसाधनों के क्षय और पर्यावरणीय असंतुलन से संरक्षण, आवर्तनशील उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग की ओर।

कार्यक्रम इन दोनों क्षेत्रों की समस्याओं को परस्पर संबंधित मानता है और इनके समाधान के लिए मूल्य शिक्षा को एक साझा आधार के रूप में प्रस्तावित करता है।

शिक्षा से स्वराज्य व्यवस्था तक

AKSG का दृष्टिकोण व्यक्ति में समझदारी के विकास से प्रारंभ होकर परिवार, समाज और मानवीय व्यवस्था में उसकी अभिव्यक्ति तक आगे बढ़ता है।

01व्यक्तिस्वयं को, अपने संबंधों और जिम्मेदारियों को समझना तथा मानवीय आचरण विकसित करना।
02परिवारसंबंधों में विश्वास और न्याय का निर्वाह करना, भौतिक आवश्यकताओं को पहचानना तथा समृद्धि के लिए उत्पादन में भागीदारी करना।
03समाजसहयोग, सामूहिक जिम्मेदारी और मानवीय आचरण की साझा समझ को स्थापित करना।
04व्यवस्थापरिवार-मूलक व्यवस्थाओं का विकास करना, जिनके माध्यम से समुदाय अपनी सामूहिक जिम्मेदारियों में भागीदारी कर सकें।

इस क्रम में शिक्षा को सामाजिक विकास का प्रारंभिक आधार माना गया है और परिवार को मानवीय व्यवस्था की मूल इकाई के रूप में स्वीकार किया गया है।

इस दृष्टिकोण का व्यावहारिक स्वरूप AKSG आदर्श ग्राम कार्यक्रम के माध्यम से प्रस्तावित है।

ग्राम विकास की कार्यप्रणाली समझें

ग्राम और शहर की परस्पर पूरक भूमिका

AKSG स्वीकार करता है कि व्यापक मानवीय व्यवस्था में गाँव और शहरों की अलग-अलग क्षमताएँ और जिम्मेदारियाँ हैं। ज्ञान, कौशल, संसाधनों और उत्पादन के आदान-प्रदान के माध्यम से दोनों का विकास परस्पर पूरक हो सकता है।

ग्राम का योगदान

  • गाँव कृषि, स्थानीय उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन, सामुदायिक सहयोग तथा प्रकृति के साथ जीवन जीने के व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से योगदान देते हैं।
अस्तित्व सह-अस्तित्व है

शहर का योगदान

  • शहर उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी विशेषज्ञता, विशेष कौशल, प्रबंधन क्षमता और वितरण व्यवस्था के माध्यम से योगदान देते हैं।

कार्यक्रम का प्रस्ताव है कि इन क्षमताओं को परस्पर पूरक तरीके से व्यवस्थित किया जाए, जिससे स्थानीय स्वावलंबन को बढ़ावा मिले और ग्राम तथा शहर की परस्पर निर्भरता को समझते हुए दोनों का विकास हो सके।

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